अपनी आज़ादी को हमें अब साधना है

पाया भी है हमने और खोया भी
अगर कुछ छूट गया है, टूट गया है
तो बहुत कुछ हमने गढ़ा भी है यहीं

अगर गरीबी अभिशाप बन अभी भी सताती है
तो विकास के प्रतिमान भी हमने देखे हैं यहीं

अगर भूख अभी भी चेहरों पर बिलबिलाती है
तो सोते हैं बहुत अपने घरों में भी

हां बोल नहीं पाते हैं अपनी बीमारी पर
और लाचार धकेले जाते हैं अपनी दुनियादारी पर
पर इसी समाज से निकलती है कहीं कोई आवाज़
जो कर जाती है एक नए संघर्ष का आगाज़

इतिहास से हमने सीखा है
और वर्तमान को लिखने की कोशिश अब करनी है

क्या हुआ के हम अभी भी लड़खड़ाते हैं
और ‘क्या नहीं कर पाए’ में उलझ जाते हैं
क्या आकाश हमें नहीं बुलाता है
और क्या सूरज को हमने नहीं मापा है

हां हम साध नहीं पाए हैं अपने ताने-बाने को
इंसान और देश की गति को एक पैमाने पर

देश आगे बढ़ता ही रहा है इन सालों में
पर इंसान कहीं पीछे रह गया इन सवालों से
कब इस भूल को सुधारेंगे हम
कब इंसान और देश को एक मानेंगे हम

जो देश ने पाया है पर इंसान ने खोया है
देखना होगा वो भ्रम किसकी आँखों में सोया है

आज़ाद हैं हम ये आवाज़ उठाने के लिए
क्या ये नहीं हमारी सफलता है
देश हमारा देता ये अवसर हमें
क्या नहीं ये इसकी सरलता है

आज़ाद तो हैं हम बरसों से
हां इसे हमें अब साधना है
हमारे सवाल जो पीछे रह गए हैं
उस क्यों को पहचानना है

जो गढ़ा है हमने देश के लिए
वही प्रतिमान हम इंसानों के लिए भी हो
गरीबी और भूख की सिसकियों से आगे
वही वर्तमान हम इंसानों के लिए भी हो

©SantoshChaubey

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